संत गाडगे बाबा जी
जीवन-परिचय
जन्म - 23/02/1876
मृत्यु 14/12/1956
फरवरी के महीने में दो अति महत्वपूर्ण संतों का जन्म हुआ। इस प्रकार दोनों ने ही इस देश को स्वच्छता, समानता, भाईचारा का संदेश दिया। एक महान संत मध्यकाल में थे, जो अछूत समाज में जन्म लेकर अपनी योग्यता और तपस्या से ऐसे समाज को जो सदियों से अछूत समाज को स्वीकार नही कर पर रहा था, इस संत ने अपने आप को स्वर्ण समाज को स्वीकार करने के लिये ही विवश ही नही किया बल्कि सदियों से चली आ रही कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिये भी सवर्ण समाज को प्रेरित किया। जिनको हम रेदास और संत रविदास के नाम से जानते है, जिनकी शिष्या चित्तौडग़ढ़ की महारानी मीराबाई राजपूत थी।
गाडगे बाबा भी रेदास के पदचिन्हों पर चलकर और रदास को अपना गुरू मानकर 1905 में समाज में चली आ रही कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिये अपना घर त्याग दिया। और गांव-गांव जाकर ऐसे वर्ग को जगाने का कार्य किया, जो जागते हुये भी सदियों से सो रहे थे। बाबा गाडगे मध्यकालीन सूफी संत और भक्तिकालीन संत तथा महावीर विशेषकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं से बहुत अधिक प्रभावित थे। इन संतों के द्वारा समाज को जागृत करने का कार्य किया गया था, इन्ही कार्यों को बाबा गाडगे ने आगे बढ़ाया। बाबा गाडगे सामाजिक व्यवस्था के तहत् स्वयं शिक्षित नही हो सके, इसकी पीड़ा उनके मन में हमेशा रही और यह पीड़ा अंतिम समय तक उनके प्रवचनों में सुनाई देती रही। इसलिये देश के बहुजनों को बाबा के द्वारा शिक्षित होने का संदेश दिया गया था, इन्होनें चाखामेला, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम आदि से प्रभावित होकर इनको अपनाया।
गाडगे बाबा, बाबा भीमराव अम्बेडकर से लगभग 15 वर्ष उम्र में बड़े थे, लेकिन दोनों में गहरी मित्रता थी और दोनों ही बहुजन, वंचित समाज की उन्नति और इनके विकास के लिये हमेशा विचार विमर्श किया करते थे। यह संबंध दोनों का दिखावा नही बल्कि आत्मिक संबंध थे। दोनों का एक ही लक्ष्य था, कि सदियों से प्रताडि़त वंचित समाज को भेदभाव मुक्त और जातिवाद उन्मुलन किस प्रकार किया जाये। बाबा गाडगे का हमेशा यह तर्क रहा कि कानून और नियमों से जातिवाद, छूआछुत, भेदभाव का उन्मुलन नही किया जा सकता, जब तक की समाज का एक ऐसा वर्ग जो सदियों से स्वयं को विशेषाधिकार प्राप्त मानता है, उसके मन में इन वंचितों, दलितों के प्रति दया और सम्मान की भावना जागृत न हो। संत गाडगे बाबा के कार्यों और विचारों से बाबा भीमराव अम्बेडकर को बहुत ताकत मिली थी। इसका परिणाम यह हुआ कि भीमराव अम्बेडकर के विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। अम्बेडकर जी को नैतिक साहस ही नही बल्कि बहुजनों का जन समर्थन मिला, जिससे बाबा भीमराव अम्बेडकर ने सामाजिक परिवर्तन के लिये कई आंदोलन चलाये। इन्ही आंदोलनों का ही परिणाम था, कि अंग्रेजों ने बहुजनों, दलितों को
शासकीय सेवाओं में प्रवेश देकर, इन वर्ग को शिक्षित करने के लिये कई योजनाएं चलाई थी। संत गाडगे बाबा हमेशा बाबा भीमराव अम्बेडकर से कहा करते थे, कि बहुजनों को शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही सत्ता प्राप्त हो सकती है, जिसको बाबा भीमराव अम्बेडकर ने स्वीकार किया। संत गाडगे बाबा और अम्बेडकर ने वंचित, दलितों को हमेशा यह संदेश दिया कि सत्ता प्राप्त करने के बाद सम्पत्ति और शक्ति दोनों ही प्राप्त होती है। इनसे ही सामाजिक परिवर्तन किये जा सकते है।
स्वच्छता के प्रतीक के रूप में संत गाडगे बाबा की पहचान महाराष्ट्र में ही नही बल्कि पूरे भारत में बन चुकी है। संत गाडगे बाबा जहां-जहां भी भ्रमण किया करते थे, उन गांवों और नगरों में स्वच्छता का संदेश देकर स्वयं ही साफ-सफाई में लग जाते थे। इनको किसी भी प्रकार की आत्म ग्लानी नही होती थी, कि इनके द्वारा झाडू लेकर साफ-सफाई की जाती थी, यह देखकर ग्रामीण लोग इनको स्वीपर समझने लगे थे, जबकि वह रजक समाज से संबंधित थे। इस प्रकार सभी को साफ-सफाई का संदेश नगर के प्रत्येक नगरवासी को दिया जाता था, चाहे वह किसी भी समाज, जाति, धर्म का हो। वर्तमान में भी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा स्वच्छता अभियान चलाये जा रहे है। कहीं-न-कहीं हम यह कह सकते है, कि संत गाडगे बाबा के अधूरे कार्यों को सरकार और जनता द्वारा पूरा किया जा रहा है। ऐसे महामानव को भारत रत्न से सम्मान किया जाये, तब भी संत गाडगे बाबा के सम्मान में कम होगा। महाराष्ट्र सरकार द्वारा इनके सम्मान में महाराष्ट्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। महाराष्ट्र सरकार ने ही 01 मई 1983 को नागपुर विश्वविद्यालय का विभाजन कर अमरावती में संत गाडगे बाबा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। यहीं नही बाबा की 42वीं पुण्यतिथि पर इनके संघर्ष और त्याग स्वच्छता का संदेश आदि किये गये कार्यों को दृष्टिगत रखते हुये महाराष्ट्र सरकार ने 20 दिसम्बर 1998 को बाबा के चित्र का डाक टिकिट जारी किया गया था। वर्ष 2001 से ग्राम स्वच्छता पुरस्कार भी संत गाडगे बाबा के नाम पर ही महाराष्ट्र की ग्राम पंचायतों को देकर गांव का सम्मान दिया जाता है।
संत गाडगे बाबा हमेशा अपने प्रवचनों में भीमराव अम्बेडकर का जिक्र किया करते थे और समाज में युवाओं को डॉ. अम्बेडकर जैसा बनने की प्रेरणा भी देना नही भुलते थे। वर्ष 1942-43 में महाराष्ट्र के मनमाड़ में विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था, जिसमें बहुजनों को समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कर्मकाण्ड त्यागने आदि के संबंध में प्रवचन दिये जा रहे थे। इसी दौरान बाबा भीमराव अम्बेडकर के द्वारा समाज के उत्थान, विकास एवं इन वर्गों को अधिकार दिलाने के लिये जो संघर्ष बाबा साहब अम्बेडकर के द्वारा किये जा रहे थे, इन संघर्षों पर लम्बे समय तक संत गाडगे बाबा ने समाज को अवगत कराया। 1943 में ही संत गाडगे बाबा का स्वास्थ्य खराब होने से बाबा भीमराव अम्बेडकर जब वह बीज मंत्री हुआ करते थे, अपने व्यस्ततम् कार्यक्रमों को छोड़कर संत बाबा का स्वास्थ्य हालचाल जानने उनके घर पहुंचे, तब बाबा ने अम्बेडकर जी से कहा की
आपका समय बहुमूल्य है, इसलिये आप मेरे स्वास्थ्य की चिंता न करें। समाज के विकास में अपना पूरा समय दे और कहा कि भीम तुमसे समाज को बहुत उम्मीद है, इससे ही अनुमान लगा सकते है, कि संत गाडगे बाबा समाज के प्रति कितने चिंतित थे। संत गाडगे बाबा ने पण्ढरपुर की विशाल धर्मशाला जो कि वह महात्मा गांधी के अनुयायिओं को दान करना चाहते थे, अपना विचार बदलकर 1943 में पण्ढरपुर की विशाल धर्मशाला और सम्पत्ति बहुजनों के विकास और सामाजिक परिवर्तन हेतु बाबा भीमराव अम्बेडकर को सौंप दी गई थी। आज भी यह धर्मशाला संत चोखामेला के नाम से विख्यात है।
जब बाबा भीमराव अम्बेडकर हिन्दू समाज की सामाजिक व्यवस्था, जातिवाद, भेदभाव, पक्षपात, जातिय प्रताडऩा, अंधविश्वास आदि से दुखी होकर हिन्दू धर्म त्याग कर अन्य धर्म को स्वीकार करने का मन बना चुके थे। इस संबंध में भी बाबा भीमराव ने संत गाडगे बाबा से लम्बे समय तक कई दिनों तक चर्चा की और बाद में बाबा भीमराव अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया और नागपुर में विशाल जनसभा को संबोधित कर बाबा भीमराव अम्बेडकर के साथ लाखों हिन्दुओं ने बौद्धधर्म स्वीकार कर लिया। बाद में 06 दिसम्बर 1956 को बाबा भीमराव अम्बेडकर का निधन हो गया। बाबा अम्बेडकर के निधन के बाद संत गाडगे बाबा दुखी रहने लगे। दुख का कारण यह था, कि अम्बेडकर के निधन के बाद वह स्वयं को अकेला महसूस करने लगे और इस महामानव संत गाडगे बाबा जिन्होने सारा जीवन स्वच्छता अभियान और बहुजनों के विकास में लगाया, इनका निधन 14.12.1956 को मात्र अम्बेडरक के देहांत के 06 दिवस पश्चात् ही हो गया। ऐसे दोनों महान संतों के निधन के बाद कई वर्षों तक बहुजनों की आवाज उठाने के लिये आज तक स्थान खाली है। इसप्रकार फरवरी माह में संत रविदास, संत गाडगे बाबा का जन्म हुआ और माह दिसम्बर में संत बाबा अम्बेडकर, संत गाडगे बाबा का निधन हुआ, यह भी एक संयोग है।
लेखक- संतोष कुमार लडिय़ा
उप जेल अधीक्षक
केन्द्रीय जेल उज्जैन (म.प्र.)