देशभर में कांग्रेस के विधायक आखिर पार्टी छोड़ क्यो भाग रहें है...?

चुनाव से पहले टिकट के लिए दल-बदल का खेल तो आम हो चुका था, लेकिन जब चुनाव जीतने के बाद भी विधायक या सांसदों की दलगत आस्था डगमगा जाए तो क्या कहेंगे...? 

राज्य अलग-अलग लेकिन कांग्रेस की कहानी एक । जरूरत के समय कांग्रेस के विधायक पार्टी छोड़ने पर क्यो आमादा हो जाते है...? क्या कांग्रेस का पार्टी संगठन इतना कमजोर हो चुका है । जो अपने विधायकों को संभाल नही पा रहा है । कर्नाटक और मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस के इतने विधायक बागी हो गए कि कांग्रेस की सरकार ही चली गयी । राज्यसभा चुनाव आने के पूर्व गुजरात मे भी कांग्रेस अपने विधायकों को लेकर भागे-भागे फिरने को मजबूर है । आखिर कब तक विधायकों को बिकाऊं बताकर शीर्ष नेतृत्व आंख बंद करके बैठा रहेगा । राहुल गांधी के सबसे खास ज्योतिरादित्य सिंधिया पर जब बिकने का आरोप कांग्रेस ने लगाया लेकिन जनता के मन मे एक सवाल उठा सिंधिया ट्रस्ट के पास अरबों की संपत्ति है आखिर उन्हें कौन खरीद सकता है...? ऐसे ही अनेक विधायक रहें जो हजारों वोटो से जीतकर आये जिनकी लोकप्रियता के दम पर कांग्रेस सत्ता में आती है,आखिर उन्हें कांग्रेस क्यो नही सँभाल पाती है...? बहुत मेहनत करके इंतजार के बाद चुनाव जीतना फिर भाजपा या अन्य दल में जाने की आखिर ऐसी क्या मजबूरी हो जाती है जो एक साल में फिर चुनाव में जाने का डर भी मन से हट जाता है...? भारतीय राजनीति में आचरण की शुचिता और वैचारिक प्रतिबद्धता का लोप हुए बहुत लंबा अरसा बीत चुका है, लिहाजा व्यक्तिगत या सामूहिक दल-बदल की खबरें अब किसी को भी चौंकाती या हैरान नहीं करती हैं। लेकिन कांग्रेस में यह सबसे ज्यादा क्यो होता है...? जबकि कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी राजनीति पार्टी है । तो आखिर इस पार्टी से उसके ही कार्यकर्ताओं का मोह भंग क्यो होता जा रहा है । 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दल सबसे अहम हैं और वे सामूहिक आधार पर फैसले लेते हैं ।लेकिन आजादी के कुछ साल बाद ही राजनीतिक दलों को मिलने वाले सामूहिक जनादेश की अनदेखी की जाने लगी । विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं ।इस स्थिति ने राजनीतिक व्यवस्था में अस्थिरता ला दी । तब दल-बदल कानून की आवश्यकता महसूस की गई । आपने "आया राम और गया राम" की कहवात सुनी ही होगी, यह कहावत भारतीय राजनीति में बहुत ज्यादा तब प्रचलित हुई जब 1967 में हरियाणा के एक विधायक "गयालाल" ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली ।इस मौकापरस्ती की प्रथा को बंद करने के लिए 1985 में 52वां संविधान संशोधन किया गया और संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई जिससे कि पार्टी छोड़कर भागने की प्रथा पर काबू पाया जा सके । साल 1985 में, राजीव गांधी सरकार संविधान में संशोधन करने और दल-बदल पर रोक लगाने के लिए एक विधेयक लाई गई और 1 मार्च 1985 को यह लागू हो गया । संविधान की 10 वीं अनुसूची, जिसमें दल-बदल विरोधी कानून शामिल है, को इस संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया । साल 2003 में संसद को 91वां संविधान संशोधन करना पड़ा, जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया, 

 दरअसल दल-बदल की समस्या के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि हर स्थिति में दल-बदल अवसरवाद या महत्वाकांक्षा या लोभ के कारण ही होता हो, ऐसा भी नहीं है। इसके मूल में कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र में स्वीकृत पार्टी प्रणाली भी है और साथ ही राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव भी। इस समय कांग्रेस में इसी आंतरिक लोकतंत्र का अभाव नजर आ रहा है । सालों पुराने नेता एक झटके में पार्टी को छोड़ देते है जबकि भाजपा में ऐसा अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलता है । कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व केवल चुनाव के समय ही सक्रिय नजर आता है बाकी समय उसका संपर्क जमीनी नेताओं से टूट जाता है । इन नेताओं का प्रदेश के नेता जब लगातार शोषण करते है तो उनकी सुनने वाला कोई नही होता मजबुरी में कांग्रेस छोड़ने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नही होता है । मध्यप्रदेश में 15 साल बाद सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस का संगठन शून्य नजर आया सत्ता के लोग संगठन के बचे-कुचे लोगो को भी दबाने लगे । वार्ड स्तर पर पार्टी का संगठन मात्र दिखावा बनकर रह गया है । सत्ता जाने के बाद जनता के बीच पार्टी की सक्रियता शून्य हो गयी है । लॉक डाउन के कारण कांग्रेस पर ही लॉक नजर आ रहा है,जनता की मदद में एक भी कांग्रेसी सड़क पर नजर नही आया । कोरोना वायरस से जंग में भी कांग्रेसी नेता केवल सरकार की बुराई में लगे रहें जनता की मदद से किसी का सरोकार नही रहा । जनता की मदद करने वाले असली हीरो सोनू सूद को भी कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी का एजेंट बताकर जनभावनाओं का अपमान किया जिसे जनता ने बखूबी देखा और समझा । कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान पीएम मोदी ने शुरू किया था लेकिन उसे पूरा स्वयं कांग्रेस करने पर आमादा है । 

(उक्त लेख के किसी भी हिस्से को लेखक की सहमति के बिना कॉपी करना गैरकानूनी है ,कॉपी करने पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी )

लेखन एवं संकलन मिलिन्द्र त्रिपाठी