लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों के आगे पेट पालने की मजबूरी ,वापस दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर 

सेतु संकल्प न्यूज़।  प्रवासी मजदूरों को क्या गृह क्षेत्रों में मिल पायेगा काम...? क्या यह सुंदर सपना टूट जाएगा ? देश मे कोरोना महामारी के कारण लॉक डाउन लागू किया गया था । जिसका सबसे अधिक प्रभाव प्रवासी मजदूरों पर पड़ा । एक अनुमान के मुताबित देशभर में लगभग 10 करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर है ।एक ओर जहां कारोबारियों को अनलॉक-1 में मजदूरों की कमी महसूस हो रही है, वहीं लॉकडाउन की वजह से गांव लौटे मजदूर भी काम न मिलने की वजह से परेशान हैं। मजबूर होकर कुछ मजदूर अपने मालिकों को फोन लगाकर कह रहे हैं कि वे वापस आना चाहते हैं।लॉक डाउन लगते ही पहले महीने के अंदर 80 प्रतिशत प्रवासी श्रमिकों को मालिकों ने काम से हटा दिया और ज्यादातर को मकान मालिकों ने कमरे खाली करने को कह दिया। वे कुछ भोजन-पानी के लिए बाजार निकलें तो पुलिस की लाठियां और भीतर रहें तो भूखों मरने की नौबत...! इसी डर ने मौत से भी उनका खौफ खत्म कर दिया। उन्हें साधन न मिलने के बाद भी पैदल ही सैकड़ों मील दूर अपने गांवों को पैदल चलने को विवश किया।  प्रवासी श्रमिकों की सुध लेने की चिंता इतनी देर से हुईं कि तब तक दर्जनों भूख बीमारी और दुर्घटनाओं में जान गवां चुके थे।लॉकडाउन के दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों की वापसी पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच रार मची हुई थी, जबकि मजदूर  पैदल और चोरी-छिपे घर आने को मजबूर थे । एक बड़ा सवाल यह भी है कि इन मजदूरों का आगे का जीवन कैसे चलेगा...? लॉकडाउन हटने के बाद एक बार फिर मालिकों को श्रमशक्ति का एहसास हो गया है । देश के कोने-कोने में हर तरह के उद्योग धंधे का हिस्सा बन चुके कुशल और अर्द्धकुशल कामगार व मजदूरों ने काम-काज ठप्प होने के बाद अपने गांव का रुख किया है । मजदूर लोग पैदल, साइकिल, बसों या फिर श्रमिक स्पेशल ट्रेन से अपने घरों को चल पड़े सस्ते श्रम का साथ छूटता देख एक ओर जहां हरियाणा, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व तेलंगाना जैसे राज्य परेशान हैं वहीं माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों से कहा कि प्रवासी मजदूरों के लिए काउंसलिंग सेंटर की स्थापना की जाए । उनका डाटा इकट्ठा किया जाए, जो गांव स्तर पर और ब्लाक स्तर पर हो । इसके साथ ही उनकी स्किल की मैपिंग की जाए, जिससे रोजगार देने में मदद हो । अगर मजदूर वापस काम पर लौटना चाहते हैं तो राज्य सरकारें मदद करें । पलायन के दौरान मजदूरों पर दर्ज किए गए लॉकडाउन उल्लंघन के मुकदमे वापस लिए जाएं।  सभी मजदूरों का रजिस्ट्रेशन किया जाए और जो मजदूर घर जाना चाहते हैं, उन्हें 15 दिन के अंदर घर भेजा जाए । प्रवासी मजदूरों को अगर गृह क्षेत्र में रोजगार मिलेगा तो बाहर जाने की आवश्कता नहीं पड़ेगी। 

लॉकडाउन में परेशानियों से जूझते हुए यह श्रमिक अपने घर तक पहुंचे हैं। अधिकांश श्रमिकों का कहना है कि वह अब दूसरे राज्यों में काम करने के लिए नहीं जाना चाहते हैं। राज्य सरकार प्रदेश के किसी भी शहर में रोजगार उपलब्ध करा दे,तो उन्हें किसी दूसरे राज्य में भी जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गांव में मनरेगा योजना में इतना काम भी नहीं है,जिससे प्रवासी श्रमिक अपने परिवार का पेट पाल सकें।

लॉकडाउन के बाद से दूसरे राज्यों व जिलों से बड़े पैमाने पर मजदूर घरों को लौट रहे हैं। उनके सामने आर्थिक संकट न गहराए और कोई भी भूखा न रहे, इसके लिए सरकार ने सभी को काम उपलब्ध कराने व सरकारी योजनाओं का लाभ देने के निर्देश अफसरों को दिए हैं। इस पर जनपद में अमल शुरू हो गया है। बाहर से आने वाले प्रत्येक श्रमिक का नाम, पता व अन्य जानकारियां हासिल कर अलग ही रिकार्ड तैयार किया जा रहा है। लेकिन यह केवल सपना बनकर न रह जाये...! क्योकि रजिस्ट्रेशन करने के बाद काम उपलब्ध करना सबसे बड़ी चुनौती है । अफसरों के हाथ मे छोड़ देंने मात्र से यह संभव नही होगा सरकारों को स्वयं इस कार्य मे निगरानी करनी होगी । यह बोलने में पढ़ने में जितना आसान लग रहा है उतना आसान है नही...! क्योकि लॉक डाउन के बाद काम की तलाश में मजदूर अपने गांव शहर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने शुरू कर चुका है । यदि उसे काम नही मिला तो वो वापस पलायन करने को मजबूर हो जाएगा । उसके पास सरकारों को जल्द से जल्द स्थाई विकल्प उपलब्ध कराना होगा । 

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लेखन एवं संकलन मिलिन्द्र त्रिपाठी